अच्छा ! तो प्रधान सेवक को सत्ता संभाले तीन साल हो गए। तीन साल मतलब के 1095 दिन। 2014 में अच्छे दिनों की आस में लोगों ने वोट दिया। जबरदस्त लहर, आंधी के तौर पर सामने आई और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाल ली। लेकिन 1095 दिनों में अच्छे दिन तो कभी दिखे ही नहीं। दिखे भी तो वो बस चुनावी रण में जीत हासिल करने वाली पार्टी को। अब ये तो जग जाहिर है कि कौनसी पार्टी इन दिनों चुनावों में झंडे गाढ़ रही है।
2014 में सरकार बनने के बाद आम लोगों को आस थी कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे। सरकार बनी, कामकाज शुरू हुआ लेकिन अच्छे दिन तो दिखे ही नहीं। लोग कहते थे बच्चा पैदा होने में भी नौ महीने का टाइम लगता है। अभी तो सरकार आई है अच्छे दिन आने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। उस समय मन को शांत कर लेते थे कि चलो ठीक है थोड़ा वक्त तो लगता ही है। लेकिन अब तीन साल बाद क्या ? तीन साल बाद तो अगले बच्चे की तैयारी होने लगती है और यहां है कि अच्छे दिनों का अभी इंतजार है।
तीन साल में स्टूडेंट को डिग्री हासिल हो जाती है और आज भी वो डिग्री लेने के बाद रोजगार की तलाश में भटकता है। लेकिन यहां तो प्रधान सेवक ने तीन सालों में 275 करोड़ की विदेशों में उड़ान भरी है। बताइए ! यहां कुशल लोग भी 4-5 हजार की शुरुआती नौकरी को तरस रहे हैं और जनाब ! ये सेवक तो राज कर रहा है। सेवक कभी राज करता है क्या ? सिर्फ एक दिन का आंकड़ा देखें तो लगभग 25 लाख रुपये उनकी उड़ान पर एक दिन के खर्च होते हैं। भारत की आधी से भी ज्यादा की जनता अपनी पूरी जिंदगी में भी 25 लाख रुपये नहीं कमा सकती है। ये हैं अच्छे दिन ? अच्छे दिन बोले तो प्रधान सेवक के एक दिन की उड़ान का खर्चा 25 लाख रुपये। और ये पैसा कहां से आता है ? ये पैसा उस आदमी की जेब से आता है जो रोजाना दिन-रात मेहनत करके अपने सीनियर की डांट सुनता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो धूप में पसीना बहाकर लोगों को रिक्शे में एक-जगह से दूसरी जगह पर लेकर जाता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो खेती बाड़ी कर पूरे देश का पेट पालता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो सड़क किनारे ठेले लगाते हैं और प्रशासन उन्हीं पर अतिक्रमण हटाने के लिए डंडे चलाता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से देश का हर नागरिक अपनी जेब से टैक्स देता हैं और प्रधान सेवक जी विदेशों की उड़ान भरके दो भाषण और कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करके चले आते हैं। और हां ये पैसा उन अंधे भक्तों की जेब से भी आता है जो हर-हर... घर-घर.... का नारा हर वक्त जुबां पर रखते हैं।
खैर, सेवक महोदय तो 100 दिनों में काला धन भी लाने वाले थे। लेकिन यहां तो बस नोटों का रंग हरे से बदल कर गुलाबी ही हुआ है। काले धन को सफेद करना तो सुना था पर ये हरे नोटों को गुलाबी रंग में बदल देना पहली बार देखा। नोटबंदी का फैसला बड़ा था। कुछ वक्त के लिए दिक्कत आई, सह गए लेकिन इस फैसले के पीछे क्या पूरी तैयारी थी ? अगर पूरी तैयारी होती तो लोगों को महीनों तक घंटों-घंटों कतारों में ना लगना पड़ता और अगर कतारों में ना लगना पड़ता तो लोगों की कतारों में खड़े-खड़े मौत भी नहीं होती। उन जिंदगियों की भरपाई कौन करेगा जो अपना खर्चा निकालने के लिए लंबी कतारों में खड़े हुए और फिर खड़े ही ना हो पाए। जिनके परिवार में इस तरह से मातम पसर जाए क्या उनके लिए भी थे अच्छे दिन ? इस दर्द को विदेशी उड़ान भरने वाला कहां तक समझेगा ?
दर्द की ही बात करें तो पड़ोसी दुश्मन आंख दिखा रहा है, जवानों का मार रहा है और प्रधान सेवक 2019 के चुनावों की रणनीति बनाने में फिलहाल व्यस्त हैं। सेना हमारी रक्षा कर रही है लेकिन सेना की रक्षा कौन करेगा ? नक्सली हमारे जवानों को मार रहे हैं लेकिन अब उनको कौन मारेगा ? सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सेना को खुली छूट क्यों नहीं मिल जाती ? क्या हमारे पास गोलियां कम पड़ गईं ? क्या हमारे पास जवानों की कमी पड़ गई ? क्या हम जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम नहीं हैं ? 56 इंच का सिना प्रधान सेवक का नहीं उस जवान का है जो छाती पर गोली खाकर शहीद हुआ है। लेकिन अब क्या ? तीन साल में सैंकड़ों जवान शहीद और बस एक सर्जिकल स्ट्राइक ! ये हैं अच्छे दिन ? लगभग हर रोज सीजफायर उल्लंघन हो रहा है लेकिन सूट-बूट वाले सेवक चुप बैठे हैं !
तीन साल बाद मुद्दे आज भी मुद्दे ही बने हुए हैं। ना कश्मीर का मुद्दा सुलझा सके और ना काला धन का। माल्या मालामाल है और मेहनत करने वाले कंगाल है। ऊपर से प्रधान सेवक कह रहे हैं कि हम कौशल का विकास कर रहे हैं। लेकिन कौशल होने के बावजूद लोग तो आज भी बेरोजगार है। ऐसी शिक्षा ही किस काम की जो लोगों को रोजगार ना दिला सके। उद्दमिता की बात करते हैं । लेकिन उद्दमिता को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन ना के बराबर। बजट में तो आपने उद्दमिता के नाम पर लॉलीपॉप पकड़ा के छोड़ दी। प्रधान सेवक लोगों से सब्सिडी छोड़ने की बात करते हैं। अजी ! हमने छोड़ दी सब्सिडी । पर इसका फायदा क्या हुआ ? हमे ना सही उन लोगों को जिनके लिए हमने सब्सिडी छोड़ी ? ऐसी में सेवक बैठे, हेलिकॉप्टर में सेवक घूमे, विदेशी यात्रा पर सेवक जाए और सब्सिडी छोड़े हम । वाह ! अच्छे दिन । लोग शौचालय और स्वच्छता में ही पड़े रह गए और प्रधान सेवक मित्रों... और भाईयों-बहनों कहकर थोड़ा सा भावूक होकर संवेदनाएं लूट ले गए।
स्वच्छता की बात करें तो गंगा को साफ करने में तीन साल लगते हैं क्या जी ? तीन साल में ही साफ नहीं कर पाए । इतने हजारों करोड़ रुपये गंगा की सफाई में लगाए जा रहें फिर भी परिणाम हाथ नहीं लग रहे तो काहे के अच्छे दिन ? गौरक्षा के नाम पर हिंसा क्यों ? गौरक्षा ही क्यों हम तो हर पशु और जानवर की रक्षा के समर्थक हैं लेकिन हिंसा के नहीं ? गौरक्षा को मुद्दा बनाकर हिंसा करना अच्छे दिन है ? प्रधान सेवक मंदिर जाते हैं कभी किसी धाम के दर्शन करके आते हैं तो कभी कहीं मंदिर में अभिषेक भी करते हैं। लेकिन क्या कभी प्रधान सेवक ने गौर किया की मंदिरों के बाहर तीन साल बाद आज भी गरीब एक रोटी के लिए तरसता रहता है और हाथ फैलाए बैठा रहता है। उनके लिए नहीं थे क्या अच्छे दिन ? अरे ! आज कल तो अच्छे खाने के लिए बोलने से भी डर लगता है । पता चला की हमने अच्छे खाने के लिए आवाज उठायी और हमारा हाल भी सेना के उस 'तेज' और 'बहादुर' जवान की तरह ही कर दिया जाए। उसको तो सेना से बर्खास्त किया, हमें कहां से बर्खास्त करेंगे ? खाने का तो पूछिए मत.. आज बाजार में 50 रुपये खर्च करके भी एक आदमी अपना एक टाइम का खाना खाकर पेट नहीं भर सकता और संसद में 30 रुपये में भी सांसद पेटभर कर खाना खाता है। गज़ब के अच्छे दिन ।
खुद को प्रधान सेवक कहने वाले महोदय जी, एक के बाद एक चुनाव में आप फतह कर रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि लोग खुश हैं और खुशी में आपको वोट डाल रहे हैं। इसका सीधा सा ये मतलब है कि लोगों के पास फिलहाल कोई विकल्प नहीं है और आपसे अभी भी उम्मीदें बंधी है। लेकिन जिस दिन पूरी तरह से उम्मीदें टूटीं और दूसरा विकल्प मिला तो आपका हाल दिल्ली चुनाव की तरह भी हो सकता है। भले ही नया विकल्प कैसा भी हो लेकिन एक बार को जनता नया विकल्प मिलते ही आपको तो उखाड़ फेंकेगी ! खैर, बाकी बचे सालों में आपकी सरकार के लिए उज्जवल भविष्य की कामना ।
