Sunday, 6 August 2017

नेता पर पत्थर पड़े तो आह, सेना पर पड़े तो वाह !



भगवान ने पत्थर भी क्या खूब चीज बनाई है। एक-एक पत्थर जोड़कर मजदूर घर बनाता है और जब पत्थर बच जाए तो यही लोगों के सर पर मारने के लिए भी काम आता है। भई पत्थर को भी सुर्खियों में रहना पसंद है। तभी तो कभी ये पत्थर किसी नेता पर जा गिरता है तो कभी सेना के जवानों पर पड़ता है। ये पत्थर भी बड़ा चालाक है। अगर किसी आम आदमी पर पत्थर मारा जाए तो कोई बात नहीं, मामला रफा-दफा हो जाता है लेकिन यही पत्थर किसी VIP या बड़े नेता पर मारा जाए तो साहेब पत्थर की नेशनल हेडलाइन बनना तो तय है। हालांकि पत्थर की हेडलाइन तो तब भी बनती है जब सेना पर पत्थर मारा जाए लेकिन उसके बाद जो होता है उसमें जमीन आसमान का अंतर है।

किसी नेता पर पत्थर मारा जाए और वो भी ऐसे नेता पर जो किसी विशेष दल का मुख्य चेहरा हो तो जनाब यहां बवाल कट जाता है। चप्पे-चप्पे पर नेता के समर्थक प्रदर्शन करने लगते हैं साथ ही कार्रवाई की मांग भी होती है। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो जाती है। विपक्षी लोग सत्ताधारियों का पुतला फूंकते हैं। मार्च तो ऐसे निकालते हैं जैसे जिंदगी में सिर्फ मार्च निकालने का ही ठेका ले रखा हो। और तो और अगर सत्ताधारी लोग उस नेता पर हुए पथराव की निंदा नहीं करते तो इस पर भी ऐतराज जताते हैं कि भई वो लोग पथराव की निंदा नहीं कर रहे हैं। अरे.. निंदा भी कोई जबर्दस्ती करवाने वाली चीज है क्या मित्रों..?? निंदा ना करें तो क्या उखाड़ लोगे ? सत्ता में रहते हुए तो कुछ उखाड़ ना सके अब विपक्षी बनकर क्या करवा लोगे ?

खैर, ये तो बात हुई नेता की लेकिन जब यही पत्थर सेना के जवानों पर गिरे तो ये सिर्फ नेशनल हेडलाइन ही बनकर रह जाती है। लोग खबर पढ़ते हैं कि कितने घायल हुए ? कोई शहीद भी हुआ या नहीं ? बस लोगों का यही काम है। विपक्षी दल सत्ताधारी लोगों पर निशाना साधकर बाद में चुप्पी साध लेते हैं। वहीं जब सत्ताधारी लोगों से इस मसले पर जवाब तलब किया जाता है तो वो जमकर निंदा करते हैं। इतनी निंदा करते हैं जितनी आज तक जिंदगी में ना की होगी। और अगले ही दिन कोई दूसरी हेडलाइन सेना पर पथराव की घटना की जगह ले लेती है। मामला खत्म।

भई पत्थर ने तो मजे ले लिए लेकिन कई सवाल छोड़ दिए। सवाल ये कि क्या एक नेता से कम कीमती है सेना के जवानों की जान ? जब सेना पर पथराव होता है तब ये विपक्षी और सत्ताधारी कहां चले जाते हैं ? सेना पर पथराव के बाद ना कोई मार्च होता है, ना कोई प्रदर्शन। मामला दबकर रह जाता है। 'पड़ोसी आंख भी उठाकर देखेगा तो हम उसका सर काट कर ले आएंगे' ऐसा कहने वाले प्रधान सेवक आज तक जवानों पर पत्थर मारने वाले लोगों का एक बाल तो उखाड़ ना सके। सर कहां से लाएंगे ? पूर्ण बहुमत की सरकार होने के 3 साल बाद भी धारा 370 पर जिक्र तक नहीं किया। अब उसे हटाने की तो दूर की बात है।


जुमलों की सरकार ने विपक्ष को भी अपाहिज बना दिया है। एक नेता है जो कि हर वक्त मौका खोजने में लगा रहता है कि कब और कहां अपनी सरकार बनाई जा सकती है। इन्हें सरकार बनाने के अलावा और कुछ आता ही नहीं, वहीं दूसरा ठहरा पप्पू ! अब पप्पू से क्या उम्मीद की जा सकती है ? पप्पू खुद पत्थर की मार झेल रहा है। अब बची सेना,, तो नेता पर हुए पथराव के बाद सेना से यही कहा जा सकता है कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।