Thursday, 22 December 2016

एक और साल बीत गया (Ak aur Sal Bit Gaya)



बीतते-बीतते एक साल और बीत गया. ये साल भी बड़ा अजीब होता है. हर साल आता है और हर साल चला जाता है और साल की खास बात ये होती है कि यह कभी लौट कर भी नहीं आता है. बस कुछ यादें छोड़ कर रवानगी ले लेता है. यादें... कुछ अच्छी तो कुछ बुरी. इस साल में भी कुछ खास बातें होती है. कुछ चिजें साल को पंसद नहीं होती वो छोड़ कर चला जाता है और कुछ चीजें हमेशा के लिए अपने साथ ले जाता है. भुखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेईमानी ये सब इसे कतई पंसद नहीं है और इन्हें यहीं छोड़ कर जाता है. राजनीतिक पार्टियों के तमाम दावे भी खोखले नजर आते हैं जब उनके दावों का साल के आगे बस नहीं चल पाता और ये चीजें हर नए साल में भी वहीं की वहीं बनी रहती है.
अब साल 2016 भी रवानगी ले रहा है. 365 दिनों का भारत का ये सफर ज्यादातर मित्रों...या भाईयों और बहनों...से शुरू होने वाले संवाद को सुन-सुन कर ही निकल गया. और जिन्होंने ये संवाद नहीं सुने होंगे उनका सफर इस संवाद को करने वाले प्रधान सेवकका विरोध करते-करते खत्म हो गया. विरोध में सबसे आगे जंग से हर समय जंग करने वाले उस मुख्यमंत्री के नाम रहा जो अभी तक लोकपाल नहीं ला पाया. साल भर में ये महाशय इतने आगे रहे की विरोध करते करते इनकी जुबान ही घीस गई और उसका उन्हें ऑपरेशन तक करवाना पड़ा. खैर विपक्ष का काम है विरोध करना. साल 2016 विपक्ष के इस काम को भी अपने साथ नहीं ले जा रहा है. अगर इस विरोध को अपने साथ ले जाए तो कम से कम संसद की कार्यवाही तो सुचारू रूप से चल सकती है. इस लाइन में अब नए साल में कहीं ईरोम शर्मीला जी ना आ जाएं. जिन्होंने काफी सालों बाद अपना अनशन तोड़ा था और अनशन तोड़ने के बाद राजनीति में आने का ऐलान किया था.
राजनीति में अच्छे अच्छों को बदलते, मुकरते और जूते खाते देखा है. राजनीति के दलदल से शर्म के मारे शर्मीला जी कहां तक बचेंगी. बचने से याद आया कि साल 2016 अपने साथ बैंको को चूना लगाकर भागने वाले इंसान को भी अपने साथ ले उड़ा. बैंक बेचारे चिल्लाते रह गए और वो बाहर ऐश कर रहा है. असल में अच्छे दिन तो माला-माल माल्या जी के ही आएं हैं.
बैंक की जब बात चली ही है तो ये साल जाते-जाते बैंकों की भी निंद हराम कर गया. जिन लोगों ने बैंक की सीढ़ियां भी नहीं चढ़ीं थी वही लोग इस साल बैंक के बाहर लगे ATM की पूजा करने लगे. अब लोग समझ नहीं पा रहें हैं कि नए 2000 के नोट का अचार डाले या 2000 रुपये के दाम का पूरा अचार ही खरीद लें. लेकिन कहना पड़ेगा इस साल ने नोटबंदी के कारण छोटे से लेकर बड़े लोगों तक चिल्लरों की अहमियत जरूर बता दी. साल 2016 शुरू होने पर जो लोग नोटों के बिस्तर पर सोते थे. साल खत्म होने तक उनको नोटों का बिस्तर तो दूर ओढ़ने को चद्दर तक नसीब नहीं हो रही है.
अब बात जब नसीब की आई है तो कोहली का भी इस साल विराट नसीब देखने को मिला. एक के बाद एक ताबड़तोड़ पारियों की बदौलत लोग उसे नया सचिन कहने लगे. इन विराट पारियों की वजह से कोहली कई रिकॉर्ड तोड़ भी दें और कई रिकॉर्ड बना भी दें पर देखना ये होगा कि क्या वो आने वाले सालों में क्रिकेट के भगवान जैसा मान-सम्मान हासिल कर पाएंगे ? मान सम्मान की बात करें तो मान तो इस साल भारत की बेटियों ने रियो ओलंपिक में बढ़ाया. कम से कम नाक कटाने से तो बचा ही लिया. 
लोग कहते थे कि प्रधान सेवक के आने से पड़ोसी देश भारत की ओर आंख उठा कर भी नहीं देख पाएगा. शायद कहने वाले सही कहते थे क्योंकि पड़ोसी देश इस साल भी आखं बंद करके अंधा-धुंध फायरिंग जो करता रहा है. सर्जिकल स्ट्राइक हुई लेकिन जवान तो फिर भी इस साल शहीद हुए हैं. पड़ोसी देश ने पीठ पर छुरा तो इस साल भी घोपा है साल 2016 तो गुजर गया और गुजर गए कुछ चेहरे भी. अब ना तो ये साल वापस आएगा और नाहीं वो चेहरे वापस आएंगे. कथित तौर पर ये अमीरों की सरकार मुआवजा देकर बस पिंड छुड़ा लेती है. अब हादसे में मरने वाले, देश के लिए शहीद होने वालों के परिवार के लोगों को मुआवजा देना एक ट्रेंड बना चुका है. अगर देना ही हो तो उनके परिवार के लोगों को स्थायी और अच्छे वेतन पर रोजगार ही दे दिया जाए. जब कमाने वाला ही नहीं रहा तो मुआवजे से कब तक घर चलेगा ?
साल 2016 के जाने की टिकट तो बुक हो चुकी है और इसकी ट्रेन तो भारतीय ट्रेन की तरह कैंसिल या लेट भी नहीं होगी. 2016 के जाने का दिन और वक्त फीक्स है. उम्मीद की जा सकती है की अच्छे दिनों के वादे करने वाली सरकार अगले साल से यातायात व्यवस्था को सुधार कर समय की पाबंद बने.
अब आने वाले 365 दिनों के लिए हम अच्छे की ही उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि बुरे के लिए उम्मीद तो खुद को पाक-साफ कहने वाला हमारा पड़ोसी देश और हंगामें की उम्मीद तो विपक्षी पार्टियां भी कर ही रही हैं.

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