Friday, 15 September 2017

क्या 'गरीबों की सरकार' अमीरों के लिए बुलेट ट्रेन ला रही है ? (Kya garibon ki sarkar amiron ke liye bullet train la rahi hai?)


वाह ! प्रधान सेवक जी, वाह ! आपकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है. आखिर देश को विकास के पथ पर आगे लेकर जाने वाले आप जैसे प्रधान सेवक की तारीफ तो होनी ही चाहिए. और अब तो आपकी तारीफ के लिए एक और मौका मिल गया क्योंकि आपकी ''गरीबों की सरकार'' अमीरों के लिए बुलेट ट्रेन जो लेकर आ रही है.

कथित विकास को बढ़वा देने वाली आपकी गरीबों की सरकार अब बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करने के लिए गरीब मजदूर से पत्थर भी उठाएगी, उनसे गर्मी-सर्दी में काम भी करवाएगी, काम ठीक से नहीं करने पर पैसे भी रोक सकती है या काट सकती है ! और फिर जब सब काम पूरा हो जाएगा तो प्रधान सेवक जी वाहवाही लूटेंगे और फिर बुलेट ट्रेन में अमीर सफर करेगा. सही कह रहा हुं ना सेवक जी ? वो गरीब जो बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करने के लिए अब गर्मी-सर्दी में काम करेगा, उसे तो मेहनताना भी उतना नहीं मिलेगा जितना एक तरफा बुलेट ट्रेन की यात्रा का किराया होगा.

विकास होना चाहिए, विकास का मैं भी पक्षधर हुं सेवक जी. लेकिन 'सबका साथ, सबका विकास' वाली फील इसमें नहीं आ रही है. सच कहुं तो मैं तो तीन साल से सबका साथ, सबका विकास वाली फील लेने की कोशिश कर रहा हुं लेकिन ये फील ऐसी है की कभी फील करना चाहुं तो भी फील ही नहीं होती. हर बार गरीबों का साथ लेकर अमीरों का विकास करने वाली फील आती है. लेकिन प्रधान सेवक जी आप भी गजब करते हैं, गंजे को भी कंघी बेच देते हैं फिर बेचारा गंजा भी अफसोस करता रहता है कि वो भी किसके झांसे में आ गया.

बहुत मेहनत और बहुत सालों के इंतजार के बाद देश में बुलेट ट्रेन का सपना साकार होने वाला है. पूरा देश करे ना करे लेकिन मैं तो आपके इस कदम की तारीफ करता हुं. लेकिन प्रधान सेवक जी, बुलेट ट्रेन तो जब चलेगी तब देखा जाएगा, आप ये बताएं कि अपने देश की रेल के हालात कब सुधर रहे हैं ? मंत्री बदलने से सुधर जाएंगे क्या ? नई ट्रेनें चलाने से सुधर जाएंगे क्या ? किराया बढ़ाने से सुधर जाएंगे क्या ? एक कहावत है कि विरोधी भी कई बार सही सलाह दे देता है. तो प्रधान सेवक जी आपके एक विरोधी ने रेल का मंत्री बदले जाने पर गजब की बात कही थी. उन्होंने कहा, 'खूंटा बदलने से नहीं, संतुलित आहार देने से भैंस ज्यादा दूध देगी'. कुछ समझे प्रधान सेवक जी  ? चारा खाकर डकार भी ना लेने वाला इंसान आपको सही राय दे रहा है.

लेकिन कुछ भी कहो प्रधान सेवक जी, आप इंसान बड़े गजब के हो. आने वाले दिनों में बुलेट ट्रेन में सफर करेगा अमीर और रोजमर्रा की तरह पेसेंजर या एक्सप्रेस ट्रेन के जनरल डिब्बे में धक्के खाएगा देश का गरीब इंसान. अरे.. अरे माफ कीजिएगा, जनरल डब्बे में धक्के भी गरीब तभी खाएगा जब उसमें पैर रखने की जगह भी मिल जाएगी. आज के हालात ऐसे बने हुए हैं कि एसी डिब्बे में अमीर इंसान सो के जा रहा है और जनरल डब्बे में गरीब को पैर रखने तक की जगह नहीं मिल पाती है.

कोई बात नहीं प्रधान सेवक जी, आप बुलेट ट्रेन लाइए हम आपके साथ हैं. लेकिन जब नींव ही कमजोर है तो आप महल कैसे बना लेंगे सेवक जी ? जब आए दिन रेल पटरी से उतर रही है और इस कारण से लोगों की भी मौतें हो रही है तो क्या आपकी गरीबों वाली सरकार सिर्फ मृतकों के परिवार वालों को मुआवजे देने तक ही सीमित है क्या ? आप नहीं जानते क्या सेवक जी कि बचाव ही उपचार है. अगर पहले ही पटरियों की मरम्मत के लिए आप पैसा लगाते तो कम से कम लोगों को अपनी जान से तो हाथ नहीं धोना पड़ता. बुलेट ट्रेन लाने की जिम्मेदारी आप ने ले ली लेकिन जब रेल पटरी से उतर रही है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा सेवक जी ? प्रधान सेवक जी, आपने बुलेट ट्रेन की नींव रखी. देश आपको इस काम के लिए दशकों तक याद रखेगा. लेकिन सेवक जी, खराब रेलवे हालातों के कारण सैंकड़ों लोगों की जान जा रही है. इसको कैसे भूलेंगे ?

अब तो प्रधान सेवक जी आपने लोगों पर भी जीएसटी का बोझ डालकर खजाना भरना भी शुरू कर दिया है. थोड़ा उसमें से चवन्नी, अठन्नी फीसदी रेल सुधार में भी लगा दीजिए. बुलेट ट्रेन तो खैर आपके कहे अनुसार 'मुफ्त की सेवा' है, जब बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में कोई पैसा लग नहीं रहा तो रेलवे का बुनियादी ढांचा सुधारने के लिए आपकी मुठ्ठी क्यों बंद है ?

प्रधान सेवक जी, आपकी बातों से कभी-कभी मैं बढ़ा ही प्रभावित होता हुं. आपने कहा कि बुलेट ट्रेन आने से देश में रोजगार में बढ़ोतरी होगी. वाह ! प्रधान सेवक जी, वाह ! आपके इसी बयान का तो मैं इंतजार कर रहा था. आपके कहे अनुसार देखा जाए तो आप भी ये मानते हैं कि देश में रोजगार में फिलहाल कमी है. मानते हैं कि नहीं ? अगर रोजगार में कमी है तो 3 सालों में आपने रोजगार बढ़ाने के लिए क्या किया ? उल्टा नोटों को बंद करके लोगों के कामकाज ठप्प कर दिए. जब कामकाज ही ठप्प हो गए प्रधान सेवक जी तो रोजगार कहां से बचेगा लोगों का ? यही नहीं, जीएसटी लाकर चीजें सस्ती करने की बजाय महंगी हो गई.

आप ही बताइए प्रधान सेवक जी, लोगों के कामकाज ठप्प होने, रोजगार चले जाने और चीजें महंगी हो जाने से क्या वो बुलेट ट्रेन में सफर करने लायक बचा होगा क्या ? आप अपने अधिकारियों का भत्ता बढ़ा देते हो, वेतन आयोग में बदलाव करके अधिकारियों की मौज कर देते है तो अब कभी आप मजदूर और गरीब तबके को इस लायक बनाएंगे क्या कि वो भी जनरल डिब्बे को छोड़कर बुलेट ट्रेन में सफर कर सके ? उनकी आमदनी बढ़ाएंगे क्या आप ? फिलहाल कुछ लोगों को मिलने वाले फायदे से क्या मेरा देश आगे बढ़ रहा है प्रधान सेवक जी ?

Sunday, 6 August 2017

नेता पर पत्थर पड़े तो आह, सेना पर पड़े तो वाह !



भगवान ने पत्थर भी क्या खूब चीज बनाई है। एक-एक पत्थर जोड़कर मजदूर घर बनाता है और जब पत्थर बच जाए तो यही लोगों के सर पर मारने के लिए भी काम आता है। भई पत्थर को भी सुर्खियों में रहना पसंद है। तभी तो कभी ये पत्थर किसी नेता पर जा गिरता है तो कभी सेना के जवानों पर पड़ता है। ये पत्थर भी बड़ा चालाक है। अगर किसी आम आदमी पर पत्थर मारा जाए तो कोई बात नहीं, मामला रफा-दफा हो जाता है लेकिन यही पत्थर किसी VIP या बड़े नेता पर मारा जाए तो साहेब पत्थर की नेशनल हेडलाइन बनना तो तय है। हालांकि पत्थर की हेडलाइन तो तब भी बनती है जब सेना पर पत्थर मारा जाए लेकिन उसके बाद जो होता है उसमें जमीन आसमान का अंतर है।

किसी नेता पर पत्थर मारा जाए और वो भी ऐसे नेता पर जो किसी विशेष दल का मुख्य चेहरा हो तो जनाब यहां बवाल कट जाता है। चप्पे-चप्पे पर नेता के समर्थक प्रदर्शन करने लगते हैं साथ ही कार्रवाई की मांग भी होती है। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो जाती है। विपक्षी लोग सत्ताधारियों का पुतला फूंकते हैं। मार्च तो ऐसे निकालते हैं जैसे जिंदगी में सिर्फ मार्च निकालने का ही ठेका ले रखा हो। और तो और अगर सत्ताधारी लोग उस नेता पर हुए पथराव की निंदा नहीं करते तो इस पर भी ऐतराज जताते हैं कि भई वो लोग पथराव की निंदा नहीं कर रहे हैं। अरे.. निंदा भी कोई जबर्दस्ती करवाने वाली चीज है क्या मित्रों..?? निंदा ना करें तो क्या उखाड़ लोगे ? सत्ता में रहते हुए तो कुछ उखाड़ ना सके अब विपक्षी बनकर क्या करवा लोगे ?

खैर, ये तो बात हुई नेता की लेकिन जब यही पत्थर सेना के जवानों पर गिरे तो ये सिर्फ नेशनल हेडलाइन ही बनकर रह जाती है। लोग खबर पढ़ते हैं कि कितने घायल हुए ? कोई शहीद भी हुआ या नहीं ? बस लोगों का यही काम है। विपक्षी दल सत्ताधारी लोगों पर निशाना साधकर बाद में चुप्पी साध लेते हैं। वहीं जब सत्ताधारी लोगों से इस मसले पर जवाब तलब किया जाता है तो वो जमकर निंदा करते हैं। इतनी निंदा करते हैं जितनी आज तक जिंदगी में ना की होगी। और अगले ही दिन कोई दूसरी हेडलाइन सेना पर पथराव की घटना की जगह ले लेती है। मामला खत्म।

भई पत्थर ने तो मजे ले लिए लेकिन कई सवाल छोड़ दिए। सवाल ये कि क्या एक नेता से कम कीमती है सेना के जवानों की जान ? जब सेना पर पथराव होता है तब ये विपक्षी और सत्ताधारी कहां चले जाते हैं ? सेना पर पथराव के बाद ना कोई मार्च होता है, ना कोई प्रदर्शन। मामला दबकर रह जाता है। 'पड़ोसी आंख भी उठाकर देखेगा तो हम उसका सर काट कर ले आएंगे' ऐसा कहने वाले प्रधान सेवक आज तक जवानों पर पत्थर मारने वाले लोगों का एक बाल तो उखाड़ ना सके। सर कहां से लाएंगे ? पूर्ण बहुमत की सरकार होने के 3 साल बाद भी धारा 370 पर जिक्र तक नहीं किया। अब उसे हटाने की तो दूर की बात है।


जुमलों की सरकार ने विपक्ष को भी अपाहिज बना दिया है। एक नेता है जो कि हर वक्त मौका खोजने में लगा रहता है कि कब और कहां अपनी सरकार बनाई जा सकती है। इन्हें सरकार बनाने के अलावा और कुछ आता ही नहीं, वहीं दूसरा ठहरा पप्पू ! अब पप्पू से क्या उम्मीद की जा सकती है ? पप्पू खुद पत्थर की मार झेल रहा है। अब बची सेना,, तो नेता पर हुए पथराव के बाद सेना से यही कहा जा सकता है कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।

Tuesday, 16 May 2017

प्रधान सेवक की सरकार- तीन साल, कई सवाल (Pradhan Sevak Ki Sarkar- Teen Saal, Kai Sawal)



अच्छा ! तो प्रधान सेवक को सत्ता संभाले तीन साल हो गए। तीन साल मतलब के 1095 दिन। 2014 में अच्छे दिनों की आस में लोगों ने वोट दिया। जबरदस्त लहर, आंधी के तौर पर सामने आई और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाल ली। लेकिन 1095 दिनों में अच्छे दिन तो कभी दिखे ही नहीं। दिखे भी तो वो बस चुनावी रण में जीत हासिल करने वाली पार्टी को। अब ये तो जग जाहिर है कि कौनसी पार्टी इन दिनों चुनावों में झंडे गाढ़ रही है।

2014 में सरकार बनने के बाद आम लोगों को आस थी कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे। सरकार बनी, कामकाज शुरू हुआ लेकिन अच्छे दिन तो दिखे ही नहीं। लोग कहते थे बच्चा पैदा होने में भी नौ महीने का टाइम लगता है। अभी तो सरकार आई है अच्छे दिन आने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। उस समय मन को शांत कर लेते थे कि चलो ठीक है थोड़ा वक्त तो लगता ही है। लेकिन अब तीन साल बाद क्या ? तीन साल बाद तो अगले बच्चे की तैयारी होने लगती है और यहां है कि अच्छे दिनों का अभी इंतजार है।

तीन साल में स्टूडेंट को डिग्री हासिल हो जाती है और आज भी वो डिग्री लेने के बाद रोजगार की तलाश में भटकता है। लेकिन यहां तो प्रधान सेवक ने तीन सालों में 275 करोड़  की विदेशों में उड़ान भरी है। बताइए ! यहां कुशल लोग भी 4-5 हजार की शुरुआती नौकरी को तरस रहे हैं और जनाब ! ये सेवक तो राज कर रहा है। सेवक कभी राज करता है क्या ? सिर्फ एक दिन का आंकड़ा देखें तो लगभग 25 लाख रुपये उनकी उड़ान पर एक दिन के खर्च होते हैं। भारत की आधी से भी ज्यादा की जनता अपनी पूरी जिंदगी में भी 25 लाख रुपये नहीं कमा सकती है। ये हैं अच्छे दिन ? अच्छे दिन बोले तो प्रधान सेवक के एक दिन की उड़ान का खर्चा 25 लाख रुपये। और ये पैसा कहां से आता है ? ये पैसा उस आदमी की जेब से आता है जो रोजाना दिन-रात मेहनत करके अपने सीनियर की डांट सुनता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो धूप में पसीना बहाकर लोगों को रिक्शे में एक-जगह से दूसरी जगह पर लेकर जाता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो खेती बाड़ी कर पूरे देश का पेट पालता है, उस आदमी की जेब से भी आता है जो सड़क किनारे ठेले लगाते हैं और प्रशासन उन्हीं पर अतिक्रमण हटाने के लिए डंडे चलाता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से देश का हर नागरिक अपनी जेब से टैक्स देता हैं और प्रधान सेवक जी विदेशों की उड़ान भरके दो भाषण और कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करके चले आते हैं। और हां ये पैसा उन अंधे भक्तों की जेब से भी आता है जो हर-हर... घर-घर.... का नारा हर वक्त जुबां पर रखते हैं।

खैर, सेवक महोदय तो 100 दिनों में काला धन भी लाने वाले थे। लेकिन यहां तो बस नोटों का रंग हरे से बदल कर गुलाबी ही हुआ है। काले धन को सफेद करना तो सुना था पर ये हरे नोटों को गुलाबी रंग में बदल देना पहली बार देखा। नोटबंदी का फैसला बड़ा था। कुछ वक्त के लिए दिक्कत आई, सह गए लेकिन इस फैसले के पीछे क्या पूरी तैयारी थी ? अगर पूरी तैयारी होती तो लोगों को महीनों तक घंटों-घंटों कतारों में ना लगना पड़ता और अगर कतारों में ना लगना पड़ता तो लोगों की कतारों में खड़े-खड़े मौत भी नहीं होती। उन जिंदगियों की भरपाई कौन करेगा जो अपना खर्चा निकालने के लिए लंबी कतारों में खड़े हुए और फिर खड़े ही ना हो पाए। जिनके परिवार में इस तरह से मातम पसर जाए क्या उनके लिए भी थे अच्छे दिन ? इस दर्द को विदेशी उड़ान भरने वाला कहां तक समझेगा ?

दर्द की ही बात करें तो पड़ोसी दुश्मन आंख दिखा रहा है, जवानों का मार रहा है और प्रधान सेवक 2019 के चुनावों की रणनीति बनाने में फिलहाल व्यस्त हैं। सेना हमारी रक्षा कर रही है लेकिन सेना की रक्षा कौन करेगा ? नक्सली हमारे जवानों को मार रहे हैं लेकिन अब उनको कौन मारेगा ? सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सेना को खुली छूट क्यों नहीं मिल जाती ? क्या हमारे पास गोलियां कम पड़ गईं ? क्या हमारे पास जवानों की कमी पड़ गई ? क्या हम जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम नहीं हैं ? 56 इंच का सिना प्रधान सेवक का नहीं उस जवान का है जो छाती पर गोली खाकर शहीद हुआ है। लेकिन अब क्या ? तीन साल में सैंकड़ों जवान शहीद और बस एक सर्जिकल स्ट्राइक ! ये हैं अच्छे दिन ? लगभग हर रोज सीजफायर उल्लंघन हो रहा है लेकिन सूट-बूट वाले सेवक चुप बैठे हैं !

तीन साल बाद मुद्दे आज भी मुद्दे ही बने हुए हैं। ना कश्मीर का मुद्दा सुलझा सके और ना काला धन का। माल्या मालामाल है और मेहनत करने वाले कंगाल है। ऊपर से प्रधान सेवक कह रहे हैं कि हम कौशल का विकास कर रहे हैं। लेकिन कौशल होने के बावजूद लोग तो आज भी बेरोजगार है। ऐसी शिक्षा ही किस काम की जो लोगों को रोजगार ना दिला सके। उद्दमिता की बात करते हैं । लेकिन उद्दमिता को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन ना के बराबर। बजट में तो आपने उद्दमिता के नाम पर लॉलीपॉप पकड़ा के छोड़ दी। प्रधान सेवक लोगों से सब्सिडी छोड़ने की बात करते हैं। अजी ! हमने छोड़ दी सब्सिडी । पर इसका फायदा क्या हुआ ? हमे ना सही उन लोगों को जिनके लिए हमने सब्सिडी छोड़ी ? ऐसी में सेवक बैठे, हेलिकॉप्टर में सेवक घूमे, विदेशी यात्रा पर सेवक जाए और सब्सिडी छोड़े हम । वाह ! अच्छे दिन । लोग शौचालय और स्वच्छता में ही पड़े रह गए और प्रधान सेवक मित्रों... और भाईयों-बहनों कहकर थोड़ा सा भावूक होकर संवेदनाएं लूट ले गए।

स्वच्छता की बात करें तो गंगा को साफ करने में तीन साल लगते हैं क्या जी ? तीन साल में ही साफ नहीं कर पाए । इतने हजारों करोड़ रुपये गंगा की सफाई में लगाए जा रहें फिर भी परिणाम हाथ नहीं लग रहे तो काहे के अच्छे दिन ? गौरक्षा के नाम पर हिंसा क्यों ? गौरक्षा ही क्यों हम तो हर पशु और जानवर की रक्षा के समर्थक हैं लेकिन हिंसा के नहीं ? गौरक्षा को मुद्दा बनाकर हिंसा करना अच्छे दिन है ? प्रधान सेवक मंदिर जाते हैं कभी किसी धाम के दर्शन करके आते हैं तो कभी कहीं मंदिर में अभिषेक भी करते हैं। लेकिन क्या कभी प्रधान सेवक ने गौर किया की मंदिरों के बाहर तीन साल बाद आज भी गरीब एक रोटी के लिए तरसता रहता है और हाथ फैलाए बैठा रहता है। उनके लिए नहीं थे क्या अच्छे दिन ? अरे ! आज कल तो अच्छे खाने के लिए बोलने से भी डर लगता है । पता चला की हमने अच्छे खाने के लिए आवाज उठायी और हमारा हाल भी सेना के उस 'तेज' और 'बहादुर' जवान की तरह ही कर दिया जाए। उसको तो सेना से बर्खास्त किया, हमें कहां से बर्खास्त करेंगे ? खाने का तो पूछिए मत.. आज बाजार में 50 रुपये खर्च करके भी एक आदमी अपना एक टाइम का खाना खाकर पेट नहीं भर सकता और संसद में 30 रुपये में भी सांसद पेटभर कर खाना खाता है। गज़ब के अच्छे दिन ।

खुद को प्रधान सेवक कहने वाले महोदय जी, एक के बाद एक चुनाव में आप फतह कर रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि लोग खुश हैं और खुशी में आपको वोट डाल रहे हैं। इसका सीधा सा ये मतलब है कि लोगों के पास फिलहाल कोई विकल्प नहीं है और आपसे अभी भी उम्मीदें बंधी है। लेकिन जिस दिन पूरी तरह से उम्मीदें टूटीं और दूसरा विकल्प मिला तो आपका हाल दिल्ली चुनाव की तरह भी हो सकता है। भले ही नया विकल्प कैसा भी हो लेकिन एक बार को जनता नया विकल्प मिलते ही आपको तो उखाड़ फेंकेगी ! खैर, बाकी बचे सालों में आपकी सरकार के लिए उज्जवल भविष्य की कामना ।

Thursday, 2 March 2017

खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब (Kheloge kudoge banoge Nawab)



खेलोगे कूदोगे तो होओगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब....

अक्सर यही बात बुर्जोंगों से कभी ना कभी सुनी होगी. सोचें.. समझें.. तो ये बात सही भी है. क्योंकि बिना पढ़ाई लिखाई के आज के दौर में जिंदगी काट पाना मुश्किल है.
सही मायनों में अगर देखा भी जाए तो आज के पढ़े-लिखे लोग जिंदगी जी नहीं रहे बल्कि काट ही रहे हैं. दो पैसे कमाने की जद्दोजहद में पूरा दिन काम में लगे रहते हैं और रात को सिर्फ सोने के लिए ही घर का रुख करते हैं. पढ़ लिखकर भी कौनसा बड़ा तीर मार रहे हैं पढ़े-लिखे लोग ? अरे! तीर तो बिना पढ़े-लिखे लोग बखूबी मार रहे हैं. चायवाला प्रधानमंत्री बन जाता है और पढ़े-लिखे लोगों को ये बात हजम नहीं होती तो वो उसकी डिग्री पर हल्ला काटने लग जाते हैं.

खैर, पढ़े-लिखे लोगों को आजकल गुमान थोड़ा ज्यादा है. तभी तो देश को मेडल दिलाने वाले खिलाड़ियों की उनके दिमाग में सिर्फ एक अनपढ़ की छवि है. ये शब्दों से खेलने वाले लोग नहीं जानते कि देश के लिए खेलना कितना मायने रखता है. इतना तो पता चल गया कि शब्दों के बाण चलाकर वाह-वाही लूटने वाले शब्दों से बाहर की दुनिया से बेफिक्र हैं क्योंकि एक कविता लिखने के लिए चंद पल ही काफी हैं लेकिन देश के लिए एक मेडल लाने के पीछे सालों की मेहनत छिपी होती है.

असल मायनों में पढ़े-लिखे अनपढ़ तो वो हैं जिन्हें देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों का सम्मान नहीं करना आता हो. अभिव्यक्ति की आजादी सबको है लेकिन उस अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सलीका सबको नहीं आता. अनपढ़ और पढ़े-लिखे होने का तकाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पढ़े-लिखे लोगों को आए दिए विरोध का सामना करना पड़ता है जिसकारण वो एक जगह ठहर जाते हैं. वहीं अनपढ़ लोग शांत रहकर अपना काम करते जाते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं.

अनपढ़ होना बुरी बात नहीं लेकिन पढ़ लिखकर भी अनपढ़ जैसी बात करना कहीं ज्यादा बुरी बात है. भले ही आप अनपढ़ है, आप में किताबी ज्ञान नहीं लेकिन अगर व्यवहारिकता है तो पढ़े-लिखे लोगों से कहीं ज्यादा अच्छी तरीके से आप जिंदगी जी पाएंगे.

पढ़े-लिखे लोग जहां अपने शब्दों से दूसरों पर कटाछ करते नहीं थकते तो वहीं देश के जख्मों पर खिलाड़ी मेडल के जरिए मरहम का काम करते हैं. पढ़े-लिखे लोगों का दायरा भले ही समंदर जितना होगा लेकिन अनपढ़ लोग भी परिदों से कम नहीं हैं... किसी शायर ने भी खूब कहा है कि..

ऐ समंदर तुझे गुमान है अपने कद पर..
मैं नन्हा सा परिंदा तेरे ऊपर से गुजर जाता हूं...

आज के दौर में देखा जाए तो…. पढ़ोगे लिखोगे तो होओगे खराब, खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाबकहीं ज्यादा सटीक बैठता है.

Tuesday, 14 February 2017

सरकार बनाने का मौका मेरे पास भी आएगा (Sarkar Banane Ka Mouka Mere Pas Bhi Aayega) #Election



ऐ नेता तुने झूठे वादों की मिनार बना डाली,
जात पर वोट मांगकर आखिरकार तुने अपनी जात दिखा डाली,
चैन की जिंदगी की आस अब भी है मुझे...
लेकिन रोटी के बदले मंहगाई बढ़ाकर तुने गरीब की औकात दिखा डाली।


नहीं हूं मैं किसी से कम ये दुनिया को मैं बताउंगा,
तेरा असली चेहरा सबके सामने मैं लेकर आउंगा,
बहुत नचाया तुने इस दुनिया को अपने आगे...
मैं आज का युवा हुं उंगली की ताकत तुझे दिखाउंगा।


खुद के फायदे के लिए इस मुल्क को तुने फिर से गुलाम बना डाला,
घटिया राजनीति से तुने राजनीति का स्तर ही गिरा डाला,
खुद को ऊपर उठाने के लिए ना जाने तुने कितनों को कुचला होगा...
ठहरेगा तु अब क्योंकि एक उंगली ने तेरा नसीब लिख डाला।


पांच सालों बाद शक्ल दिखाने वाले अब तेरा भी वक्त आएगा,
दोनों हाथों से जब वोट की भीख मांगने तु दरवाजा मेरा खटखटाएगा,
उस वक्त करूंगा तेरे पिछले सालों का एक-एक हिसाब चुकता...
क्योंकि सरकार बनाने का एक मौका मेरे पास भी आएगा।