Thursday, 21 July 2016

अपशब्द की माया ! (Apshabad ki Maya) #Maya


एक अपशब्द आपको अर्श से फर्श तक ला सकता है. इसका जीता-जागता उदाहरण यूपी के सियासी गलीयारों में देख ही लिया गया। यूपी चुनाव आने वाला है और बीजेपी नेता का किसी महिला के लिए अपशब्द का इस्तेमाल करना दिखाता है कि दो साल में ही मोदी की सेना के पर लग आए हैं।
बीजेपी नेता अब किसी महिला को खुले आम कुछ भी बोलने से नहीं हिचकिचा रहें हैं. अपशब्द बोलने के बाद सिर्फ निंदा करना और पद से हटा देना कहां तक जायज है? क्या महिला को कहे गए अपशब्द को लेकर जो कार्रवाई हुई वो इसलिए की गई क्योंकि यूपी चुनाव में बीजेपी को वोट बटोरने हैं और पार्टी कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती है? या फिर उस महिला के पलटवार से पार्टी डर गई? शायद किसी आम महिला के लिए कोई नेता अपशब्द का इस्तेमाल करता तो शायद ही नेता को उसके पद से हटाया जाता। पर अब बात पार्टी सुप्रीमो की आ गई है जो की दलित समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। इसलिए तुरंत उन महाशय को पद से हटाना पड़ा।
देखा जाए तो हटाने की वजह एक नहीं बनती। वजह काफी थी। पर आदमी का जब समय खराब चल रहा हो तो हाथी पर बैठे इन्सान को भी कुत्ता काट सकता है। यही बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष के साथ होता नजर आया है। यूपी चुनाव आने वाले हैं, पार्टी को वोट भी बटोरने हैं, जिनमें से दलित वोट भी काफी अहम साबित होंगे। पर एक मायनो में दलितों की लीडर के लिए ही अपशब्द बोल दिए जाए तो यह बात तो दलितों को भी नागवार गुजरेगी। शायद इसलिए ही मामला शान्त करने या युँ कहें की मामला रफा-दफा करने के लिए ही नेताजी को पद से हटाने का कदम उठाया गया है। वैसे भी बीजेपी के पास फिलहाल यूपी के लिए कोई चेहरा नहीं है तो पार्टी भी फिजूल के विवादों से बचना चाहेगी।
दूसरी तरफ संसद वैसे भी नहीं चल पाती। ऊपर से जब संसद सत्र आता है या सत्र की शुरूआत होती है तो कोई ना कोई बवाल मच ही जाता है जो की बीजेपी के लिए भी काफी सिर दर्द बना हुआ है। और इन्ही विवादों को जब तूल दिया जाता है तो संसद सत्र भी इन विवादों की भेंट चढ़ जाता है। फिलहाल अपशब्द की मायानेताजी को चुनावों से पहले ही मंहगी पड़ गई। और आने वाले यूपी चुनावों में माया की माया कितनी चल पाती है यह तो वक्त ज्यादा बेहतर बताएगा।

Thursday, 14 July 2016

ठुल्ले का फंडा (Thulle ka Funda) #thulla




लग रहा है कि अब केजरीवाल साहब ठुल्ला शब्द को लेकर धरने पर बैठने वाले हैं। जंतर-मंतर पर अब आम आदमी पार्टी के लोग बड़े-बड़े बैनर तले उन लोगों को करप्ट लिखेगें जिन्होंने ठुल्ला शब्द को शब्दकोश में नहीं जोड़ा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल से ठुल्ला शब्द का मतलब पुछा है। हाईकोर्ट भी हिन्दी के शब्दकोश में ठुल्ला शब्द का मतलब नहीं खोज पाने से खासा परेशान नजर आ रहा है। केजरीवाल भी अब ताव में है कि हिन्दी शब्दकोश में ठुल्ला शब्द को अब तक नहीं जोड़ा गया। पर अब केजरीवाल साहब ने भ्रष्टाचार से तंग आकर अपनी नई डिक्शनरी ही बना दी। जिसमें पुलिस वालों के लिए ठुल्ला शब्द को प्राथमिकता दी है. आखिर ठुल्ला शब्द का मतलब क्या है? केजरीवाल की डिक्शनरी की माने तो ठुल्ला शब्द पुलिसवालों के लिए समर्पित है। धन्य हो केजरीवाल जी..! जिन्होंने पुलिसवालों के लिए इतना प्यारे शब्द की खोज कर डाली। अब केजरीवाल जी इस ठुल्ला जैसे अनमोल शब्द को हिन्दी शब्दकोश में भी दर्ज करवाने जाएंगे। धन्य है वो डिक्शनरी..! जिसमें खुद को आम आदमी कहने वाले केजरीवाल साहब का कोई शब्द जुड़ेगा। बेचारी डिक्शनरी भी खुशी के मारे रो पड़ेगी। पुलिसवालों की बात की जाए तो उनकी अब छाती ही चौड़ी हो जाएगी। साथ ही अब ठुल्ले (केजरीवाल के अनुसार पुलिसवाले) अनशन पर बैठ जाएंगे की हमें केजरीवाल जी के अधीन करो, हमें केन्द्र सरकार के अधीन काम नहीं करना है।
केजरीवाल ने ठुल्ला कह कर पुलिसवालों को जो सम्मान दिया है वो जन्म-जन्म तक याद रखा जाएगा। दिल्ली के सीएम केजरीवाल की सुरक्षा में तैनात ठुल्ले (केजरीवाल के अनुसार पुलिसवाले) भी रोज उन्हें अब सलामी देगें। जब केजरीवाल का यह अनमोल शब्द हिन्दी डिक्शनरी में जुड़ जाएगा तो केजरीवाल फिर बिना रोक टोक के पुलिसवालों को गर्व से कह सकेंगे ठुल्ला। अब देखना यह होगा कि केजरीवाल का यह बेशकीमती शब्द कब तक हिन्दी शब्दकोश में जुड़ेगा।

Sunday, 3 July 2016

सेल्फी की लत (Selfie ki lat) #SelfieRow









जब से स्मार्टफोन आया है तब से लोगों का कामकाज बहुत आसान हुआ है। स्मार्टफोन की लोगों को अब ऐसी लत लग चुकी है कि यह लत अब काफी मुश्किल से ही दूर होती दिख रही है। स्मार्टफोन आया तो बहुत सी नई तकनीक भी लाया। लोगों के मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ लाया। एक ऐसी चीज जो स्मार्टफोन की स्मार्टनेस और बढ़ा देता है वो है सेल्फी
आज स्मार्टफोन ने लोगों को सेल्फी लेने का दिवाना बना दिया है। सेल्फी की लत भी लोगों को काफी बदल चुकी है। सुबह उठो तो सबसे पहले सेल्फी, नहा के तैयार हो तो सेल्फी, कहीं बाहर जाओ तो सेल्फी, किसी से मिलो तो सेल्फी, कुछ खाओ तो सेल्फी, उदास हो तो सेल्फी, खुश हो तो सेल्फी। आखिर सेल्फी लेने का क्रेज इतना बढ़ चूका है कि लोग अब किसी के साथ सेल्फी लेने से पहले सोचते भी नहीं हैं कि उसके साथ सेल्फी लेना ठीक होगा या नहीं। उन्हें तो बस  सेल्फी लेने से ही मतलब है। आखिर एक रेप पीड़ित महिला के साथ सेल्फी लेना कहां तक सही है? क्या एक रेप पीड़िता के साथ सेल्फी लेने से वो मुस्कुराने लगेगी? क्या वो पुछे जा रहे सवालों के हंसी खुशी जवाब दे देगी? सुनने में तो कुछ ऐसा ही आया है कि महिला आयोग की सदस्या ने रेप पीड़िता के साथ सेल्फी इसलिए ली क्योंकि वो ठीक से जवाब नहीं दे रही थी, असहज महसूस कर रही थी, डर रही थी। और जब सेल्फी ली तो वो हंसने लगी, जवाब भी देने लगी। क्या बेहूदा मजाक महिला आयोग की सदस्या ने किया है। खुद एक महिला होने के नाते महिला आयोग की सदस्या ने यह भी नहीं सोचा की उस पीड़ित महिला की आबरू पर प्रहार होने के बाद क्या वो महिला सेल्फी लेने से मुस्कुरा पाएगी? क्या वो खुश हो पाएगी?
मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि यह केवल एक सेल्फी मात्र थी बल्कि एक महिला जिस की इज्जत पर वार हो चुका  है, सेल्फी लेना उसकी इज्जत पर दोबारा वार के जैसा ही था। आखिर कब इन समझदार लोगों को समझ आयेगा की सब जगह मनोरंजन नहीं चलता है।
आप सेल्फी लीजिए पर कम से कम कोई ऐसा काम तो मत कीजिए जिससे किसी दूसरे के मान-सम्मान पर चोट हो। किसी और का मान-सम्मान उतना ही मायने रखता है जितना की आपका मान-सम्मान मायने रखता है।