जब से स्मार्टफोन
आया है तब से लोगों का कामकाज बहुत आसान हुआ है। स्मार्टफोन की लोगों को अब ऐसी लत
लग चुकी है कि यह लत अब काफी मुश्किल से ही दूर होती दिख रही है। स्मार्टफोन आया
तो बहुत सी नई तकनीक भी लाया। लोगों के मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ लाया। एक ऐसी
चीज जो स्मार्टफोन की स्मार्टनेस और बढ़ा देता है वो है ‘सेल्फी’।
आज स्मार्टफोन ने
लोगों को सेल्फी लेने का दिवाना बना दिया है। सेल्फी की लत भी लोगों को काफी बदल
चुकी है। सुबह उठो तो सबसे पहले सेल्फी, नहा के तैयार हो तो सेल्फी, कहीं बाहर जाओ
तो सेल्फी, किसी से मिलो तो सेल्फी, कुछ खाओ तो सेल्फी, उदास हो तो सेल्फी, खुश हो
तो सेल्फी। आखिर सेल्फी लेने का क्रेज इतना बढ़ चूका है कि लोग अब किसी के साथ
सेल्फी लेने से पहले सोचते भी नहीं हैं कि उसके साथ सेल्फी लेना ठीक होगा या नहीं।
उन्हें तो बस सेल्फी लेने से ही मतलब है।
आखिर एक रेप पीड़ित महिला के साथ सेल्फी लेना कहां तक सही है? क्या एक रेप पीड़िता के साथ सेल्फी लेने से वो
मुस्कुराने लगेगी? क्या वो पुछे जा रहे सवालों के हंसी खुशी जवाब
दे देगी? सुनने में तो कुछ ऐसा ही आया है कि महिला आयोग
की सदस्या ने रेप पीड़िता के साथ सेल्फी इसलिए ली क्योंकि वो ठीक से जवाब नहीं दे
रही थी, असहज महसूस कर रही थी, डर रही थी। और जब सेल्फी ली तो वो हंसने लगी, जवाब
भी देने लगी। क्या बेहूदा मजाक महिला आयोग की सदस्या ने किया है। खुद एक महिला
होने के नाते महिला आयोग की सदस्या ने यह भी नहीं सोचा की उस पीड़ित महिला की आबरू
पर प्रहार होने के बाद क्या वो महिला सेल्फी लेने से मुस्कुरा पाएगी? क्या वो खुश हो पाएगी?
मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि यह केवल एक
सेल्फी मात्र थी बल्कि एक महिला जिस की इज्जत पर वार हो चुका है,
सेल्फी लेना उसकी इज्जत पर दोबारा वार के जैसा ही था। आखिर कब इन समझदार लोगों को
समझ आयेगा की सब जगह मनोरंजन नहीं चलता है।
आप सेल्फी लीजिए पर कम से कम कोई ऐसा काम तो मत
कीजिए जिससे किसी दूसरे के मान-सम्मान पर चोट हो। किसी और का मान-सम्मान उतना ही
मायने रखता है जितना की आपका मान-सम्मान मायने रखता है।

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