Wednesday, 20 April 2016

भगवान महावीर (Bhagwan Mahaveer) #Mahaveer




जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी विश्व के उन महात्माओं में से एक है जिन्होंने मानवता के कल्याण के लिए राज-पाट छोड़ कर तप और ज्ञान का मार्ग अपनाया था।
भगवान महावीर स्वामी का जन्म आज से 2615 वर्ष पूर्व वैशाली (बिहार) के निकट कुण्ड ग्राम में क्षत्रीय परिवार में हुआ था। बचपन का नाम वर्धमान था। पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को वर्धमान का जन्म हुआ। भगवान महावीर का जन्म राजपरिवार में होने के कारण सुख-सुविधाओं में बीता।
30 वर्ष की आयु में इन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया। केशलोच के साथ उन्होंने घर का भी त्याग कर दिया। 12 वर्ष के कठोर तप के बाद जम्बक में एक शाल वृक्ष के नीचे उन्हें केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। 30 वर्ष तक महावीर भगवान ने त्याग, प्रेम, और अहिंसा का संदेश फैलाया।
महावीर भगवान ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया इस कारण वह जिन कहलाये और महावीर भगवान के अनुयायी जैन कहलाते है। जैन धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। जैन धर्म में अहिंसा और कर्मों की विशेषता पर विशेष बल दिया जाता है। महावीर भगवान ने मुख्य रूप से तीन सिद्धांत दुनिया को दिये।
इन्हें अगर विश्व सही रूप में अपनाये तो दुनिया में सुख शान्ति हो सकती है।
1.     अहिंसा- किसी भी जीव को मारना नहीं, हिंसा ना करना अहिंसा है। किसी का दिल दुखाना, किसी की स्वतन्त्रता को बाधित करना, किसी के साथ अन्याय एवं शोषण करना, किसी कि आजिविका बन्द कर देना अथवा करा देना ये सब हिंसा है। इनका त्याग ही अहिंसा है। अहिंसा जैन धर्म की मुख्य देन है। भगवान महावीर ने पशु-पक्षी और पेड़ पौधो तक की हत्या न करने का अनुरोध किया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त विश्व में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है। भगवान महावीर का जीओ और जीने दो का सिद्धांत जन कल्याण की भावनाओं को परिलक्ष्ति करता है। दया, करूणा, प्रेम, दान , क्षमा , सत्य आदि सभी गुण अहिंसा में आ जाते है।
2.     अनेकांत- मैं ही सही हुँ-यह एकान्तवाद और मैं भी सही हुँ-यह अनेकांतवाद। अनेकांत का अर्थ यह है की वास्तविकता को जानने के लिए अपने दृष्टिकोण के साथ-साथ विरोधी दृष्टिकोण को भी परखना।
3.     अपरिग्रह- अपनी आवश्यकताओं को सीमित और मर्यादित करना ही अपरिग्रह है। संतोष परमसुख है तथा अपनी जरुरत पुरी होने के बाद धन साधन का प्रयोग जन सेवा में करना चाहिए।
आज की आपाधापि कि दुनिया में तेज गति से बढ़ते वैज्ञानिक परिपेक्ष में आज के मानवीस समाज में दया, करुणा का अभाव हो गया है। आज का जमाना इतना बेदर्द हो गया है कि किसी अपरिचित की मौत किसी के लिए कुछ मायने नहीं रखती है। सड़क के किनारे कोई आदमी मृत या बेहोश पड़ा हो तो उसे देखते हुए हजारों लोग निकल जाते हैं पर कोई भी उसकी मदद के लिए झिझक के मारे आगे नहीं आता है। इसी तरह शव यात्रा में शामिल लोगों में हंसी मजाक की बातें, राजनीतिक चर्चायें देखने को मिलती है। ऐसे संवेदनहीन जमाने में भी हम महावीर भगवान को याद करतें। आखिर 2500 वर्ष पहले महावीर भगवान ने हमें कौनसे ऐसे मार्ग बताया था जिस कारण वो हमारे मन मस्तिष्क में समाये हुए है?
उन्होंने हमे कुछ ऐसे सिद्धांत दिए थे। उन्होंने हमें अहिंसा का ऐसा सिद्धांत दिया था, एक ऐसा मार्ग बताया था, जिस पर हम चल कर सुख-शान्ति का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि महावीर ने जो रास्ता उस समय बताया था वह उस युग में किसी काम का रहा हो पर आज की दुनिया काफी बदल गई है। पर भगवान महावीर आज भी आउट ऑफ डेट नहीं बल्कि एकदम अप-टू-डेट है। कोई भी आदमी अपने विचारों से ही अप-टू-डेट होता है। भगवान महावीर को भी उनके विचारों के लिए ही जाना जाता है। भगवान महावीर ने अहिंसा का जो उपदेश 2500 वर्ष पहले दिया था उसकी वर्तमान में जितनी आवश्कता है उतनी तो भगवान महावीर के काल में भी नहीं थी क्योंकि आज हिंसा ने भयंकर रूप धारण कर लिया है। आज हम बारूद के ढ़ेर पर बैठे हैं। कहीं से भी एक चिंगारी उठे तो दुनिया चंद लम्हों में ही बर्बाद हो सकती है। हिंसा इतनी खतरनाक हो उठी है की कदम-दर-कदम भय का वातावरण बना हुआ है। इस हिंसा का खात्मा करने के लिए आज भगवान महावीर की अहिंसा की आवश्कता अत्यधिक हो उठी है।
 पहले लड़ाईयाँ व्यक्तियों के बीच होती थी, बाद में परिवारों के बीच होने लगी और आज देश लड़ते हैं। रामायण की लड़ाई दो व्यक्तियों की लड़ाई थी, महाभारत की लड़ाई दो परिवारों के बीच थी, सन् 1965 ,1971, 1999 की लड़ाईयाँ दो देशों के बीच थी जब व्यक्ति लड़ते हैं तो व्यक्ति बर्बाद होते हैं, जब परिवार लड़ते हैं तो परिवार बर्बाद होते हैं और जब देश लड़ते हैं तो देश तबाह होते हैं। देश में इंसानों के साथ-साथ खेत-खलिहान, कल-कारखाने, पशु-पक्षी, बाजार भी तहस-नहस हो जाते हैं। देश के तबाह होने का अर्थ है इन सभी का बर्बाद होना, विनाश हो जाना। वर्तमान के परिपेक्ष में कहा जाए तो आज आंतकवादी घटनाओं ने एक विनाशकारी रुप ले लिया है। इस आंतकवाद का कोई धर्म नहीं है। देश में बढ़ती बम-विस्फोट की घटनाएं दिल को दहला देने वाली होती है। सैंकड़ो की संख्या में निर्दोश लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इस दुख को वही परिवार ज्यादा महसूस करता है जिस परिवार से कोई सदस्य इस दुर्घटना का शिकार हो जाता है। विनाश कि इस भयंकर बाढ़ को रोकने में यदि कोई समर्थ है तो वह एकमात्र भगवान महावीर कि अहिंसा ही है।
भगवान महावीर के समय में अहिंसा कि आवश्यकता जितनी नहीं थी उतनी आज है। भगवान महावीर के रूप में विश्व को उस देवदूत की आवश्कता है जो वयमनस्ता, हिंसा, घृणा, आतंकवाद से निजात दिला कर प्यार, भाईचारा और सद्भाव का निर्माण कर सके। इसलिए आज के इस वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता है

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