हिन्दु, मुस्लिम, सिख,
इसाई हम सब हैं भाई-भाई।
ये पंक्ति भारत में
बहुत ही प्रचलित है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ अनेक जाति और धर्म के लोग रहते हैं।
इसलिए भारत को विविधता में एकता का देश कहा जाता है। यहाँ इतनी सारी जाति और धर्म
होने के बावजुद भी अनेकता में एकता दिखाई देती है पर इसी एकता को भंग कर अपना
उल्लु सीधा करने वालों की आज भरमार लगी हुई है। अपना मतलब निकालने और अपनी राजनीती
चमकाने के लिए बहुत से लोग अलग-अलग जाती और धर्म के लोगों को भड़का रहे है जिस
कारण देश में जातीय और धार्मिक हिंसा पनपती जा रही है। राजनीतिक लोग अपना वोट बैंक
पुख्ता करने के लिए दो जाति और धर्मों के लोगों को एक- दुसरे के खिलाफ उकसा रहे
हैं।
“भारत माता की जय”.... इस नारे के बूते ही आजादी के समय भारत के
लोगों ने एकजुट होकर आजादी की लड़ाई लड़ी और भारत को अंग्रेजों के शासन से आजाद
करवाया पर आज इसी नारे के सहारे राजनीतिक लोग जातीय और धार्मिक हिंसा फैला कर
लोगों की एकता भंग करने में तुले हुए हैं। पहले जहाँ सब जाति, धर्म के लोगों को एक
साथ लाने, जोड़ने और आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए भारत माता की जय का नारा लगाया
जाता था वहीं आज लोगों को एक-दुसरे धर्म और जाति के प्रति भड़काने और उकसाने के
लिए भारत माता की जय का नारा लगाया जाता है।
राजनीतिक स्वार्थ आज
इतना हावी होता जा रहा है कि जातीय और धार्मिक हिंसा को रोकने या खतम करने की बजाय
इसे और बढ़ावा दिया जा रहा है। बढ़ावा भी इस तरह का की एक जाति या धर्म के लोग
दुसरी जाति और धर्म के लोगों के प्रति हीन भावना प्रकट करने लगते है। राजनीतिक
स्वार्थ इतना हावी हो जाता है कि पशुओं को जाति और धर्म से जोड़कर जातीय और
धार्मिक हिंसा पैदा की जाती है। राजनीतिक लोगों पशुओं को धर्म से जोड़ उस पर भी
राजनीति की रोटियाँ सेक रहे है।
आखिर उन पशुओं का
क्या दोष ?
पर ये राजनीति है
जिस तरीके से भारत में जातीय और धार्मिक हिंसा बढ़ रही है उसे देख कर तो यही लगता
है कि यह हिंसा देश के बंटवारे और खून खराबे के बाद भी बंद नहीं होगी।
धर्म और जातीय हिंसा
इतनी बढ़ चुकी है की राजनीतिक लोग भी इसका फायदा उठाने में बाज नहीं आते और अपनी
तीखी जुबान से इसमें आग में घी जैसा काम करते हैं। घर वापसी,लव जीहाद,धर्म
परिवर्तन जैसे बहुत से मुद्दे धार्मिक हिंसा के उभरते कारण बनते जा रहे हैं।
यह अब देश के
नागरिकों के हाथ में है की वो कैसे राजनीतिक स्वार्थ के लिए की जाने वाली धार्मिक
हिंसा को समझ पाते है और बच पाते हैं।

No comments:
Post a Comment